राशन
भानुगढ जिले में एक कस्बा है नोजख। उस नोजख कस्बे से करीब 8-9 किलोमीटर दूर छाजन नाम का एक गांव है। गांव तो उसको बोल देते हैं, वैसे वो एक बस्ती जैसे ही है। पहाडी के नीचे बसे छाजन के बारे में कहा जाता है कि ये गांव हमेशा से यहां पर नहीं था। जब भारत छोडो आंदोलन हुआ था तब नोजख में भी क्रांति का बिगुल बजा। लोगों ने जमकर आंदोलन में भाग लिया। कुछ लोग जेल भी गए। कुछ अंग्रेजी पुलिस की लाठी-गोली के भी शिकार हुए। कुछ लोग गोली के वार से मारे भी गए। कुछ लाठी खाकर फिर चलने लायक नहीं रहे। पूरे नोजख में डर और गुस्सा भर गया। कस्बे के उत्तरी हिस्से के कुछ उत्साही युवाओं ने एक अंग्रेज अधिकारी को अपनी गाडी से जाते हुए पकड लिया और उस गाडी से उतार कर खूब पीटा। इस बात का पता बाकी अंग्रेज अधिकारियों को चला तो उन्होने उत्तरी नोजख में अपने बहुत सारे सिपाही भेज दिये। उन्होने युवा, बूढे, बच्चे, औरत सबको बहुत मारा। कुछ परिवारों ने फिर वो कस्बा छोड दिया और पहा़डी की ओर जाकर छप्पर डाल कर रहने लगे। वापस नोजख लौट नहीं पाए। अंग्रेजों नें नोजख में जगह-जगह आग लगा दी। जो लोग पहाडी की ओर चले गए, उनके घर या तो जल गए या किसी और ने कब्जा कर लिया। कुछ साल बाद देश आजाद हो गया लेकिन वो लोग लौट नहीं पाए और फिर वहीं बस गये। छाजन गांव में करीब 60-70 घर हैं। घऱ तो क्या हैं, ज्यादातर झोपडियां और पाटोर हैं, जहां पर आजादी के 7 दशक बाद भी लोग गुजर-बसर कर रहे हैं। नोजख में सरकारी स्कूल है तो कुछ बच्चें वहां पढने जाते हैं। कुछ पढकर बाहर नौकरी करने चले गये और कुछ ने अपने बाकी घर वालों को भी बुला लिया। बाकी लोग छाजन में ही रहते हैं। वहां जीविका के ज्यादा साधन नहीं हैं। कुछ लोग मजदूरी करने नोजख आ जाते हैं और कुछ लोगों ने मवेशी पाल रखे हैं तो उनके सहारे, दूध आदि बेचकर पेट पाल रहे हैं। एक-दो घरों नें बस्ती के पास छोटी सी जगह पर अनाज उगाना शुरू किया था लेकिन कभी तो फसल हो जाती है और कभी बारिश में पहाडी से पानी बहकर आता है तो सब चौपट हो जाता है।
हरफूल भी यहीं रहता है। कहते हैं कि उसके दादा क्रांतिकारी थे और उस अंग्रेज अफसर, जिसको गाडी से उतार कर पीटा गया था, उसमें हरफूल के दादा भी थे। पुलिस ने उनको पकड कर जेल में डाल दिया था और महीने भर बाद खबर आई कि वो मर गए, लेकिन लाश कहीं नहीं मिली। हरफूल बचपन से यहीं रहता था। उसने शादी की थी और उसके दो बेटियां थीं। एक बेटी 'फूलिया' थी और दूसरी थी 'चमको'। फूलिया की शादी हरफूल नें पास के गांव में कर दी थी। चमको अभी छोटी थी तो उसकी शादी नहीं की। हरफूल, कमाने के लिए मजदूरी करने नोजख जाता था। जब हरफूल की शादी हुई तो उसकी पत्नी उमा भी उसके साथ जाने लगी। नोजख में कोई मकान बनाने का काम चल रहा था। आरसीसी की छत डाली जानी थी। हरफूल और उमा दोनो छत पर थे और नीचे से सीमेंट का मसाला बनाकर उपर आ रहा था और मजदूर उसे छत पर फैला रहे थें। वहीं पास में लाईट के तार जा रहे थे। वहां बंदर भी घूमा करते थे। सीमेंट-मसाला बनाने वाली मशीन और जनरेटर की आवाज से एक बंदर डर गया और इधर-उधर उछलने लगा। उछलते हुए वो लाईट के तार पर लटक गया। लाईट का तार नीचे आ गिरा। बंदर को करंट लग गया। वहीं पास में उमा खडी थी। उमा को भी तार छू गया और करंट लग गया। हरफूल ने जैसे ही ये देखा तो वो भागकर आया। उसे पता नहीं था कि जिस इंसान को करंट लगा हो, उसे हाथ से नहीं बचा सकते। उसे कुछ समझ नहीं आया। उसने उमा को पकडकर बचाने की कोशिश की तो उसको करंट का झटका लगा और छत से नीचे आ गिरा। ऊपर उमा और वो बंदर तो तब तक प्राण खो चुके थे। लोगों नें लकडी से तार को दूर किया और उमा को उठाया लेकिन अब तक तो प्राण पखेरू उड चुके थे। नीचे हरफूल पडा था। जिंदा था। पर बस जिंदा ही था। शायद उसका पैर टूट गया और कमर भी। बेहोश हो गया था। अब घर पर चमको और हरफूल बचे। हरफूल तो बस चारपाई पर पडा रहता और चमको उसकी सेवा करती। वैसे तो हरफूल को बहुत तकलीफ होती पर शौच जाना और नहाना तो जैसे-तैसे घसीटते हुए खुद ही करता क्योंकि चमको बेटी थी और बेटी से ये सेवा कैसे करवाता। पर चमको उसके बाकी चीजों का ध्यान रखती। चमको को किसी ने बोला था कि इसके पैर की मालिश कर दिया कर, पैर में जल्दी ताकत आएगी पर हरफूल बोलता कि बेटी को पैर नहीं छूने देगा। पाप लगेगा। बेटी तो देवी है। पर चमको उसकी बात नहीं सुनती और रोजाना अच्छे से पैर की मालिश करती। गरीब की सिर्फ यही दिक्कत नहीं है। गरीब की सबसे बडी दिक्कत है, उसका पेट। भूखे पेट में कुछ तो खाना चाहिए। हरफूल की बडी बेटी फूलिया हर महीने मिलने आती थी और साथ में कुछ अनाज कुछ राशन ले आती। फूलिया की सास को तो ये पसंद नहीं था, वो नाराज होती पर फूलिया का पति चोरी-छुपे कुछ न कुछ भेज देता। फूलिया का पति कहता कि देख तेरा बापू और तेरी बहन की हालत ठीक नहीं तो मैया को बिना बताए कुछ न कुछ भेज दिया कर। एक बार बापू ठीक हो जाए तो चमको का लगन छोटे से करवा देंगे। चमको इस घर की बहू बन जाएगी। फूलिया को भी ये ठीक लगता। 'छोटे', फूलिया का देवर था। अच्छा लडका था। अनाज राशन तो फूलिया दे देती, साग सब्जी तो जैसे-तैसे गांव में मिल जाती। कोई न कोई दे देता। गांव में छाछ मु्फ्त मिल जाती है। गांव के लोग, छाछ बेचना अपनी बेइज्जती समझते हैं। वो उसे मुफ्त में ही दे देते हैं। चमको हर दूसरे दिन छाछ ले आती तो खाना-पीना हो जाता। पर एक दिन खुशखबरी मिली की फूलिया को चार महीने का गर्भ है। वैसे तो खुशखबरी थी लेकिन वो दुख का कारण बन गई क्योकि अब गर्भवती फूलिया, अपने मायके नहीं आ सकती। हरफूल और चमको को मिलने वाले राशन बंद हो गया। घर में कुछ पुराने बर्तन और दादा के जमाने का टूटा-फूटा चरखा था, उनको बेचकर जैसे तैसे एक महीने का गुजारा हुआ पर भूख बेशर्म होती है। रोज आ जाती है। दिन में दो बार आ जाती है। छाजन के लोग इतने पैसे वाले नहीं थे कि इस परिवार का पेट पालते। अकेली लडकी चमको, नोजख जाकर मजदूरी भी नहीं कर सकती। हरफूल को चिंता सताती कि उसे कैसे कमाने भेजे। कुछ दिन गांव वालों ने थोडा बहुत राशन दिया पर कितने दिन देते। फिर पता चला कि सरकार नें गरीबों को मुफ्त राशन देने की योजना चलाई है। हरफूल को सुकून मिला। वो जैसे-तैसे अपने पडोसी के सब्जी के ठेले पर बैठा और चमको उसे नोजख तक लेकर आई। वहां राशन की सूची में नाम जुडवाया। राशन का डीलर बढिया आदमी था। उसके दादा, हरफूल के दादा के दोस्त थे इसलिए वो हरफूल को जानता था और उसे पता था कि इसकी आर्थिक हालत ठीक नहीं। उसने राशन वाला काम तुरंत कर दिया और हरफूल को राशन मिल गया। अब हर महीने चमको, हरफूल को सब्जी के ठेले पर बैठाकर नोजख लाती और राशन का प्रबंध हो जाता। लेकिन मुसीबत को वेश बदलना आता है। वो बहुरूपिया होती है, किसी और वेश में आ जाती है। पता चला कि सरकार नें राशन के लिए आधार कार्ड जरूरी कर दिया। हरफूल के पास आधार कार्ड कहां से आता। अगले महीने राशन नहीं मिला। राशन डीलर ने बोला कि हरफूल, इस महीनाे का राशन मैं अपनी जेब से दे देता हूं। तू आधार कार्ड बनवा ले। फिर राशन मिल जाएगा। हरफूल का एक महीने का तो प्रबंध हुआ। वो आधार कार्ड वाले के पास गए। अब आधार कार्ड के लिए फिंगर प्रिंट चाहिए लेकिन हरफूल के तो हाथ मजदूरी करते करते घिस गए कि फिंगर प्रिंट नहीं लग पा रहे। हाथ धोकर भी कोशिश की पर नहीं लगे। पता चला कि ठेकेदार नें पहले ही हरफूल का आधार बनवा दिया था लेकिन हरफूल को पता नहीं था। अब नया आधार भी नहीं बन सकता और पुराने का पता नहीं क्योंकि हरफूल की उंगलियां घिस गई थीं। हरफूल और चमको वापस छाजन आ गए। एक महीने का गुजारा तो हो गया पर फिर से बर्तन और पेट खाली। बीमार आदमी को भूख ज्यादा लगती है और भूखा आदमी ज्यादा बीमार होता है। हरफूल और चमको ने एक-दो दिन तोरई खाकर काम चलाया। तोरई की बेल चमको नें लगा दी थी। पर दो दिन के बाद क्या खाते। तीसरे दिन पडोसी ने खिचडी भिजवा दी, पर चौथे दिन का क्या। चमको ने एक-दो घरों से कुछ पैसे उधार मांगे। पांच-सात दिन गुजर गए पर आगे का क्या। अब दोनो की हालत खराब थी। हरफूल की हड्डिायां निकल आईं। तीन-चार दिन बाद जब हालत ज्यादा खराब हुई तो चमको ने बापू को बोला कि बापू,मैं फूलिया जीजी से मिल आती हूं। वहां से कुछ राशन ले आउंगी। हरफूल को कुछ पता नहीं क्या चल रहा है, वो हां भी नहीं कर पा रहा था और मना भी नहींं। चमको, फूलिया के घर गई। फूलिया को 10-20 दिन में ही प्रसव होने वाला था तो सब लोग उसी में लगे थे। फूलिया के पति ने चमको को कहा कि चमको तू कुछ पैसे ले जा और बापू की दवाई करवा ले। मैं और तेरी जीजी अभी नहीं आ सकते पर लल्ला/लल्ली होने पर तेरे लिए कुछ जरूर भेजेंगे। चमको पैसे लेकर वापस आई। रास्ते में से कुछ राशन लेकर आई और झोपडी के दरवाजे पर आकर कहा बापू मैं राशन ले आई। हरफूल की कोई आवाज नहीं आई। चमको को लगा कि बापू सो गया है। उसने कुछ नहीं कहा और बाहर आकर रोटी बनाने लगी। पडोस से छाछ मांग लाई थी। रोटी बनाकर बापू को जगाने गई कि बापू रोटी खा ले, लेकिन बापू ने नहीं सुना। चमको डर गई । उसने तीन-चार बार आवाज लगाई लेकिन बापू नहीं जागा। चमको ने बापू के गाल पर हाथ लगाकर जगाने की कोशिश की लेकिन बापू का शरीर एकदम ठंडा था। बापू अब जा चुका था। अब चमको दहाड कर रोने लगी और रोते-रोते सो गई। बेचारी चमको को ये नहीं पता था कि जब आदमी मर जाता है तो क्या करना होता है। बस उसे ये पता था कि मरे हुए को जला देते हैं। वो पहाडी की तरफ गई और लकडी तोडने लगी। पर एक तो लकडी गीली थी और चमको बेचारी कितनी सी लकडी तोड पाती। दो दिन तक बिना किसी को बताए वो थोडी-थोडी लकडियां एकट्ठी करने लगी। किसी से कुछ नहीं बोली। गांव वालो को पता भी नहीं चला कि हरफूल मर गया है। दो दिन हो गए तब भूरी काकी ने पूछा कि ऐ री चमको, हरफूल कैसा है। चमको बोली कि बापू मर गया। पर चमको के चेहरे पर आंसू नहीं थे, भावशून्य थी। गांव वालों को पता चला। अब हरफूल का अंतिम संस्कार करना था। पर कैसे करते। अंतिम संस्कार भी बिना पैसे के नहीं होता। जलाने के लिए कुछ तो चाहिए। गांव के लोगों नें पैसे इकट्ठे किये और फिर पडोस के गांव से सूखी लकडी खरीद कर लाए ताकि अंतिम संस्कार कर सकें। चमको के हाथों हरफूल को मुखाग्नि दिलावाई और हरफूल का अंतिम संस्कार किया। चमको को भूरी काकी ने अपने घर पर रोक लिया और कहा कि लाली तू आज यहीं रुक जा। तेरा काका कल तुझे फूलिया के घर छोड आएगा। फिर भूरी काकी ने काका को चमको के घर भेजा कि चमको का कुछ सामान हो तो ले आ। काका जब चमको के घर गया तो वहां पर दो दिन पुरानी छाछ, 7-8 रोटियां थीं और पास राशन की थैली में दो सेर आटा था जिसको अब चीटिंयां अपने बिल में ले जा रही थीं और एक चारपाई पडी थी जिस पर हरफूल नें आखिरी सांस ली थी।
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