‘ये’ और ‘वो’ दोनो एक ही शहर में रहते थे। वैसे अजनबी थे पर एक-दूसरे को पहचानते थे। समाज जिसे अच्छा इंसान कहता है, वो तो था ‘ये’। और ‘वो’ को समाज बुरा इंसान कहता है। शायद सही ही कहता होगा। एक दिन ‘ये’ और ‘वो’ का सामना हो गया। ऑफिस में हुआ था। ‘ये’ और ‘वो’ आमने सामने थे। ‘ये’ ने कुछ कहा। ‘वो’ ने कुछ कहा। फिर दोनो ने बहुत कुछ कहा। एक-दूसरे के भूगोल और इतिहास पर प्रश्न उठाए गए। पर एक सीमा थी। ‘वो’ ने कहा तो बस ‘कुछ भी’ कह डाला। ‘ये’ ने जो कहा वह सब ‘संसदीय भाषा’ में था और फैक्चुअली करेक्ट। फिर ‘वे’ लोगों को पता चला। ‘वे’ लोगों ने दोनो को अलग-अलग समझाया। दोनों को सलाह दी कि दोनों इंट्रोस्पेक्शन करें। यानि आत्मनिरीक्षण करें कि दोनों सहीं हैं या गलत। दोनों अपने-अपने घर चले गये। ‘ये’ ने आत्मनिरीक्षण किया तो उसने महसूस किया कि उसे क्रोधित नहीं होना चाहिए था और हालांकि सही बात कही थी लेकिन बिना सही बात कहे ही अपना काम करवा कर निकल लेना चाहिए था। उसे संयम बरतना चाहिए था और ‘ये’ ने निश्चय किया कि अगले दिन ‘वो’ से जाकर अपने व्यवहार के लिए क्षमा मांग लेगा क्योंकि क्षमा मांगने से कोई छोटा नहीं होता। ‘वो’ ने भी आत्मनिरीक्षण किया। ‘वो’ ने अपनी हर गलत बात को सही सिद्ध करने के लिए तर्क खोज निकाले। ‘वो’ ने नतीजा निकाला कि ‘वो’ सही है और शत-प्रतिशत सही है। ‘वो’ ने ‘ये’ को जो सुनाया, एकदम सटीक सुनाया। उस दुष्ट को सिर्फ सुनाना नहीं चाहिए था, उसकी खाल खींच लेनी चाहिए थी। अगली बार मिलने दो दुष्ट को, ऐसा सबक सिखाउंगा कि मेरे सामनें ‘चूं’ तक नहीं करेगा।
अगले दिन दोनो का सामना हुआ। ‘ये’ क्षमा मांगने ही वाला था कि ‘वो’ ने वो सब बोल डाला कि ‘ये’ हक्का-बक्का रह गया। ‘ये’ कुछ नहीं बोला। मूर्ख से कौन बहस करे, ये सोचकर चुपचाप वहां से निकल गया। ‘वो’ प्रसन्न हो गया। उसे और पक्का विश्वास हो गया कि ‘वो’ सही ही था, और ‘ये’ गलत ही था इसलिए ‘ये’ को चुप करवा दिया और साला... ‘ये’ पतली गली से निकल गया... हां नहीं तो... मेरे से पंगा.....।
अब दोनो के विश्वास मजबूत हो गये। ‘ये’ ने निश्चय कर लिया कि आगे से ये इन मूर्खों से बहस करने से दूर ही रहेगा और ‘वो’ ने निश्चय कर लिया कि आगे से वो सभी दुष्टों को ऐसे ही सबक सिखाया करेगा....
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