Monday, June 17, 2024

गंभीर

 गुनगुना कर गीत सारा

सार समझते जा रहा।

सर ताज से सुर ताल का

भेद समझते जा रहा।।


समझ सका ये गीत सारा

चाल समझते जा रहा।

चाल अपनी चल न सका

पर चाल चलते जा रहा।।


अधीर हुआ गंभीर हुआ

शमशीर धरते जा रहा।

धर दिया ढाल धरा पर

अब धीर धरते जा रहा।।


ये धरा अधीर हो चली

ये पथिक कहां जा रहा।

मंजिल अभी भी तय नहीं

बस चाल चलते जा रहा।।



-सौम्य

(SAUMY MITTAL

RESEARCH SCHOLAR, UNIVERSITY OF RAJASTHAN)

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